आज हम आपको बताने जा रहे हैं, एक ऐसे मन्दिर के बारे में, जहाँ जाते ही हो जाते हैं, सारे दुख दूर। बिल्कुल! आपने सही पढ़ा, तभी तो इस मन्दिर का नाम पड़ा – “Baba dukh Haran nath Mandir | आइये जानते हैं – यह मन्दिर भारत में उत्तर प्रदेश राज्य में गोण्डा जिला में स्थित है। यह मन्दिर भगवान भोले नाथ को समर्पित है। और इस मन्दिर की कहानी भगवान राम से भी जुडी है। अर्थात मन्दिर रामायण कालीन है। या कह सकते है, कि मन्दिर का इतिहास जानने के लिए हमें त्रेता युग तक जाना होगा। आइये जानते है, विस्तार से –
राम जन्म से जुड़ी है, Baba Dukh Haran Nath Mandir की कथा
त्रेता युग में अयोध्या के राजा दशरथ थे, उनके तीन रानियाँ थी, कैकेई सुमित्रा और कौशल्या। परन्तु राजा दशरथ के कोई संतान ना थी।
समय बीतता गया, राज काज चलता रहा, लेकिन राजा दसरथ को धीरे – धीरे चिंता सताने लगी, कि आज उनके पास अयोध्या की राज सत्ता है, “राज – लक्ष्मी” है, स्वयं ही सूर्य वंशी है, लेकिन फिर भी उनके कोई संतान नहीं है। इसी चिंता में डूबे राजा दशरथ अपने गुरू के पास जाते हैं।
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“गोस्वामी तुलसीदास” जी ने “रामचरित मानस” में भगवान राम के जन्म की कथा का वर्णन किया है, जिसका कुछ अंश उनके द्वारा लिखित चौपाई, दोहा व छन्द के रूप मे प्रस्तुत कर रहा हूँ। क्योंकि दुख हरण नाथ मन्दिर की जब बात आती है, तो भगवान राम के जन्म की कथा के बिना यह ब्लॉग अधूरा लगता है।
रामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है –
एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरे सुत नाहीं।।
गुरु गृह गयउ तुरत महिपाला। चरनि लागि करि बिनय बिसाला।
राजा दशरथ इसी चिंता में डूबे हुए थे, और वह अपनी चिंता के निवारण के लिए गुरु वशिष्ट के पास पहुँच गए, और उन्हें, अपनी चिंता बताई।
धरहु धीर होइहहिं सुत चारी। त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी।।
गुरु वासिष्ठ ने राजा दशरथ को समझाया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि ” हे राजन तुम्हारे चार पुत्र होंगे, जो तीनो लोकों में यश पाएंगे, और अपने भक्तों के दुखों कोई हरने वाले होंगे।
सृंगी रिषिहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्र काम सुभ जग्य करावा।।
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हे। प्रगटे अगिनि चरु कर लीन्हे।।
गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं कि गुरु वसिष्ठ जी ने श्रृंगी ऋषी को बुलाया, और उनसे पुत्र कामेस्टि शुभ यज्ञ करने कोई कहा। ऋषी जी ने भक्ति पूर्ण आहुतियाँ दी, जिससे अग्निदेव प्रसन्न हो गए, और वह अपने हाँथ में खीर [हविष्यन्न] लेकर प्रकट हुए।
यह हबि बांटी देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई।
अग्नि देव ने उन्हें खीर (पायस, हबि )देकर पिता बनने का आशीर्वाद दिया।
जोग लगन ग्रह बार तिथि’ सकल भये अनुकूल।
चर अरु अचर हर्षिजुत, राम जनम सुखमूल।।
योग लग्न गृह दिन और तिथि सब अनुकूल होने लगे, यहाँ तक कि जड़ और चेतन सब हर्षित होने लगे, क्योंकि अब भगवान श्रीराम के अवतार लेने का समय आ गया है।
नौमी तिथि मधु मास पुनीता।
सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता।।
जब भगवान राम का अवतार हुआ, तो उस समय चैत्र का महीना था। नौमी तिथि थी, शुक्ल पक्ष था, और इतना ही नहीं, भगवान श्री राम का प्रिय मुहूर्त ”अभिजीत मुहूर्त” भी था। दोपहर का समय का था, न बहुत सर्दी थी, न बहुत गर्मी थी, यह पवित्र समय ऐसा था, जो सभी लोकों को शांति प्रदान कर रहा था।

मध्यदिवस अति सीत न घामा।
पावन काल लोक विश्रामा।।
यह ऐसा समय था, कि न तो अधिक शीत पड़ रही थी, और ना ही अधिक गर्मी पड़ रही थी, दोनों के बीच के समय था। अर्थात ना तो सर्दी का मौसम था, ना ही ग्रीष्म ऋतु का प्रभाव अधिक था, बल्कि यह दोनों के ही बीच की ऋतु थी। जो कि सुहायमान ऋतू थी, जब प्रकृति चारों ओर से अपनी छटा बिखेर रही थी, कुसुम फूले हुए थे, ऐसे सुहायमान समय पर भगवान राम का पृथ्वी पर अवतार होने वाला है।
सो अवसर बिरंचि जब जाना।
चले सकल सुर साजि बिमाना।।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है, जब देवताओं ने उपयुक्त समय समझा तब देवलोक से सारे देवता अपने अपने विमान सजा कर देवलोक से अयोध्या (आकाश में) आये।
तुलसीदास जी लिखते हैँ – कि स्वच्छ निर्मल आकाश देवताओं के समूह से भर गया। आकाश से पुष्पवर्षा होने लगी, नगाणे बजाने लगे। सभी देवताओं ने स्तुति किया।
सुर समूह बिनती करि, पहुँचे निज-निज धाम।
जग निवास प्रभु प्रगटे, अखिल लोक बिश्राम।।
सारे देवताओं ने प्रभु श्री राम जी की विनती की, और विनती करने के बाद देवतागण अपने – अपने धाम वापस चले गए।
अब प्रभु श्रीराम जी ने पृथ्वी पर अवतार लिया। गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है –
”भये प्रकट कृपाला दिन दयाला, कौसल्या हितकारी।
हर्षित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।।
लोचन अभिरामा तनु घनश्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी।।
कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता।।
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहिं गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता।।
ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै।।
उपजा जब ग्याना प्रभु मुस्काना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै।।
माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।।
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।।
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गोपार।।
(गोस्वामी तुलसीदास जी कृत रामचरित मानस से)
प्रभु जी के अवतार होने पर राजा दशरथ के महल में खुशियाँ छा जाती हैं, महलो में ढूंदुभी बजने लगती है, सारी अयोध्या में बधाइयों की झड़ी लग जाती है, राजा दशरथ का महल का महल खुशियों से भर उठता है, देवतागण आकाश से पुष्प वर्षा करते हैं। सारा देवलोक भी खुशियों से गुंजायमान हो उठता है।
इन्ही सारे देवताओं के साथ में भगवान भोले नाथ भी आये थे।
जब प्रभु श्रीराम ने शिशु रूप धारण किया, तो वह रोने लगे। जैसा कि ऊपर छन्द में लिखा है- सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना………..।
(अक्सर शिशु जन्म लेते ही रोता है, श्रीराम जी लीला करने लगे) जब चुपवाने पर वह नहीं चुपे, तब प्रभु भोलेनाथ ने उन्हें चुप कराया था। उनका रोना बंद करवाकर शिव जी ने भगवान राम के ‘सारे दुःखों का हरण’ कर लिया था। कहा जा है कि इसके बाद भगवान “राम” फिर कभी नहीं रोये।
बाबा दुख हरण नाथ मन्दिर गोण्डा, उत्तर प्रदेश
मान्यता है कि, इसके बाद भगवान भोले नाथ जब देवलोक को वापस हुए, तो वापस होते समय उन्होंने, यही पर गोण्डा में इसी स्थान पर विश्राम किया था। शंकर जी ने प्रभु श्रीराम जी के दुखों का हरण किया था। इसी कारण यहाँ पर भगवान भोले नाथ ”दु:ख हरण नाथ” के नाम से जाने गए। और यहाँ पर बाबा दुख हरण नाथ का मन्दिर स्थापित हुआ।

मान्यता है, कि आज भी जो भी भक्त बाबा दुख हरण नाथ के धाम में जाते हैं, और अपना दुख बताते हैं, और अपने दुख का हरण करने के लिए शिव जी से कामना करते हैं, बाबा दुख हरण नाथ अपने भक्तों के दुःख अवश्य हरते हैं। इस प्रकार यह मन्दिर ”यथा नाम तथा गुण” के सिद्धांत पर अपने धाम आने वाले दर्शकों के दुखों का हरण कर उन्हें आत्मिक शांति प्रदान करता है।
यद्यपि यहाँ पर आने भक्त अपनी समस्या का समाधान पाते हैं, यहाँ हर सोमवार, को आने वाले दर्शनार्थीयों की संख्या अपेक्षाकृत कही अधिक होती, है। लेकिन सावन में भक्तों का पूरा सैलाब उमड़ता है।
यद्यपि मन्दिर में भक्तों का आना हर दिन लगा रहता है, कभी भी यह क्रम भंग नहीं होता है। तद्यपि यहाँ पर आने वालों में स्थानीय लोग ही होते हैं।
बाबा दुख हरण नाथ मंदिर गोण्डा, कब जायें
जैसा कि अभी ऊपर बतया जा चुका है, कि यहाँ पर लोकल एरिया से आने वाले भक्तों की संख्या ही अधिकांशतः होती है। यहाँ प्रत्येक सोवार को भक्तों का जमवाड़ा होता है, इसके अतिरिक्त सावन के माह यहाँ पर मेला लगता है।
गोण्डा कैसे जायें
अगर आप भी Baba Dukh Haran Nath Mandir जाना चाहते हैं, जाने के लिए योजना बना रहे हैं तो आप रेल मार्ग, सड़क मार्ग व हवाई मार्ग में से कोई भी विकल्प अपनी सुविधानुसार चुन सकते हैं।
निकटतम रेलवे स्टेशन गोण्डा है। इसके अतिरिक्त लखनऊ रेलवे से भी यहाँ तक पहुँचा जा सकता है। लखनऊ से गोण्डा की दूरी 100 किमी लगभग है। जो दूसरी ट्रैन से या बस या टैक्सी से तय की जा सकती है।
निकटतम हवाई अड्डा – चौधरी चरण सिंह हवाई अड्डा लखनऊ है। पहले इसका नाम “अमौसी हवाई अड्डा था। यद्यपि अयोध्या मे भी नया हवाई अड्डा का निर्माण किया गया है, जो गोण्डा के काफी निकट है।
गोण्डा कहाँ रुके
लोकल एरिया से आने लोग अक्सर शाम तक अपने गंत्वय तक पहुँच जाते हैं। दूरस्थ स्थानों से आने पर रुकने के लिए गोण्डा सिटी में रुकने के लिए होटल मिल जायेंगे। अगर आप लग्जरी होटल में रुकना चाहते हैं, तो आपके लखनऊ Best रहेगा।
FAQ
1 – दुःख हरण नाथ मन्दिर कहाँ स्थित है?
दुःख हरण नाथ मन्दिर भारत में उत्तर प्रदेश राज्य में स्थित है। यह मन्दिर लोकल एरिया का famous temple है।
2 – दुःख हरण नाथ मंदिर किस देवता को समर्पित है?
बाबा दुःख हरण नाथ मन्दिर शिव जी को समर्पित है। माना जाता है कि इस मन्दिर का इतिहास पौराणिक काल से जुडा है।
3 – बाबा दुःख हरण नाथ मन्दिर क्यों प्रसिद्ध है?
बाबा दुःख हरण नाथ मन्दिर की कहानी रामावतार से जुड़ी मानी जाती है। मान्यता है कि जब अयोध्या में भगवान राम का अवतार हुआ था, उनके शिशु रूप मे रोने पर भगवान श्री भोलेनाथ को स्वयं अयोध्या आना पड़ा था। अयोध्या से वापस जाते समय वह यहीं पर रुके थे।
4 – दुःख हरण नाथ मन्दिर क्यों जायें?
मान्यता है कि यहाँ जाने पर जो भी भक्त बाबा भोलेनाथ से अपनी कामना करता है, भोले नाथ अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण अवश्य करते हैं। मान्यता है, कि यहाँ पर आने वाले अपने हर भक्त के ”दुःख का हरण” कर लेते हैं
5 – क्या दुःख हरण नाथ मन्दिर में त्योहारों के समय विशेष आयोजन होता है?
हाँ, महाशिवरात्रि को यहाँ पर लोग अपनी अस्थनुसार भंडारे का आयोजन करते हैं। इसके अतिरिक्त सावन माह में सोमवार को भी यहाँ लोग आस्थानुसार भंडारा व अन्य धार्मिक आयोजन करते हैं।
6 – क्या मन्दिर के पास बाजार [market] उपलब्ध है?
हाँ, मंदिर के पास प्रसाद की दुकाने उपलब्ध हैं। आप यहाँ से प्रसाद व अन्य पूजा समग्री लेकिन सकते हैं। इसके gonda city मे स्थित होने के कारण यहाँ शहर का एक बड़ा बाजार [market] उपलब्ध है। जहाँ पर आप अपनी आवश्यकतानुसार shoping कर सकते हैं।
5 – गोण्डा रेलवे स्टेशन से दुःख हरण नाथ मन्दिर कैसे जायें?
गोण्डा पहुँचने पर रेलवे स्टेटन से मन्दिर कुछ ही दूर स्थित है, अतः यहाँ से आप ऑटो, ई – रिक्सा आदि से मन्दिर पहुँच सकते हैं।
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